Monday, 22 April 2013

धरनों से पहले, कानून से आगे

शुक्रवार को मेट्रो में जा रहा था कुछ दोस्तों से मिलने। हुड्डा सिटी सेंटर में कभी आप मेट्रो में चढ़ें तो देखेंगे कि लोग भूखे भेड़ियों की तरह ट्रेन की ओर देखते रहते हैं। और ट्रेन के दरवाज़े खुलते ही झपटते हैं सीटों की ओर। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। खैर अक्सर यहाँ पर लोगों को मौका मिल जाता है सीट सेलेक्ट करने का। कुछ सीटें अक्सर बच जाती हैं अगले स्टेशन के भूके भेड़ियों के लिए। जो हुड्डा के समझदार भेड़िये होते हैं वो समझदारी से रिज़र्व सीटें छोड़ के बैठते हैं। जा नहीं हैं समझदार वो महिलाओं, वृद्धों इत्यादि की सीट पर भी बैठ जाते हैं। अगले स्टेशन वालों के पास चॉइस नहीं होता है तो वो जो सीट मिले उसपर बैठ जाते हैं। मेट्रो का धन्यवाद कि एक बोगी रिज़र्व है महिलाओं के लिये।

खैर शुक्रवार हुड्डा पर बैठा मैं मेट्रो में। मेरे सामने वाली सीट महिला सीट थी। २ महिला सीटों में से एक पर महिला बैठी थी। अगले स्टेशन पर दो नौजवान चढ़े। उनमें से एक जो थोड़ा ज्यादा ठंढा (कूल) दिख रहा था, महिला सीट पर बैठ गया। अक्सर लोग बैठते हैं। महिलाएं आती हैं तो उठते हैं। खैर ठंढे बाबू के मित्र जो उनके जितने ठंढे नहीं थे उनके बगल में दरवाज़े से सट के (हट के नहीं) खड़े हो गए। १-२ स्टेशन बाद एक महिला चढ़ीं और हम दोनों के बीच आकर खड़ी हो गयीं। ये थोड़े ग्रामीण परिवेश की लग रही थीं। शायद दिल्ली की होतीं तो अपना हक़ मांगतीं। खैर वो कड़ी थीं वहाँ। मैंने ठंढे दूध (कूल डूड) की ओर देखा। सामने खड़ी महिला का उसपर कोई असर नहीं दिख रहा था। मीरा की तरह व्यवहार था उसका। खुद में ही मगन। खैर थोड़ी देर उसे ओब्सर्व करने से मुझे पता लगा की उसे एहसाह था कि उसके सामने महिला खाड़ी थी और वो महिला सीट पर बैठा हुआ था। पर वो उठना नहीं चाहता था। 

खैर मैंने सोचा कोई जुगत लगानी पड़ेगी। मैंने सोचा अगर मैं उठ जाता हूँ और महिला को बैठने को कहता हूँ तो ठंढा दूध झेप जाएगा, उसको खुद पर शर्म आएगी और वो खड़ा होकर महिला को बैठने को कहेगा। बस फिर क्या, मैं खड़ा हो गया। महिला को कहा बैठने को। वो आकर बैठ गयीं और जहाँ महिला पहले खड़ी थीं वहाँ मैं खड़ा हो गया। पर ये क्या? मेरा पैंतरा बैठा नहीं। ठंडा दूध आराम से बैठा रहा। चेहरे पर कोई शिकन नहीं, आँख में थोड़ी भी लाज नहीं। पता नहीं किसने बनाया ये सैंपल। उसका दोस्त जो अब तक स्टोरी के साइड लाइन में था, उससे बोला कि वो महिला सीट में बैठा हुआ था। दूध ठंढा था तो उसने भी ठंढा जवाब दिया। अरे महिला सब पुरुष सीट पर बैठ जाती है तो मैं महिला सीट पर क्यों नहीं बैठ सकता। दूध को कोई बताए कि पुरुषों की कोई रिज़र्व सीट नहीं है। खैर मैंने उसे कुछ नहीं कहा सोचा शयद बाकी नौजावानो की तरह वो भी हाल में हुए बच्ची के रेप के विरोध में धरना देने जा रहा होगा, बाकी देश के नौजवानों के लिए। 

ये तो हाल है इस देश का और हम पुलिस, नेताओं और बाकियों पर चिल्लाते हैं। ये हमारे समाज का ढर्रा है। इस ढर्रे को बदलने की ज़रुरत है। महिलाओं के प्रति, उनके हक़ के प्रति समाज को जागरूक होना होगा। धरना देने से और सिर्फ कानून बदलने से सबकुछ नहीं बदलेगा। हम सबको बदलना पड़ेगा। 

1 comment:

  1. हम नहीं बदलेंगे, बाकी सबको बदलना होगा.

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