Tuesday, 18 June 2013

चश्मे की धुंध

बाबा हमें हैरत से देख रहे थे और हमारा ड्राईवर बाबा को 
कुछ साल पहले की बात है। औरंगाबाद (महाराष्ट्र वाला नहीं, बिहार वाला) में घूम रहा था। तब मेरे पास नौकरी थी, गाड़ी थी (कंपनी की), बैंक बैलेंस था (छोटा सा)। लेकिन करता तब भी वही था जो आज करता हूँ। गाँव गाँव घूम कर लोगों से बातें। फर्क सिर्फ इतना है की तब सिर्फ दिन में घूमता था और अब रातों को भी घूमता हूँ। खैर, सर्दी की एक सुनहरी दोपहर में, एक खेत के पास खटिया पर बैठकर कुछ ग्रामीणों से चर्चा कर रहा था। तभी थोड़ी दूर से चलते हुए एक बुज़ुर्ग वहां पहुचे। सफ़ेद धोती और हल्का पीला कुर्ता। गाढ़ा सा एक कम्बल ओढ़े और सर पर अपना सफ़ेद गमछा लपेटे। हाँथ में सहारे के लिए एक छड़ी लिए हुए। हमलोगों से थोड़ी दूर पर खड़े हो गए, शांति से। कुछ बोले नहीं, बस ताकते रहे हमारी ओर। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ ढूंढ रहे थे। न जाने क्या? न जाने कब से?

बाबा का धुंधला चश्मा या हमारा 
ध्यान से देखा उनकी ओर तो लगा जैसे उनकी आखें सालों से कुछ ढूंढ रही थीं। कहीं विकास तो नहीं। नहीं, वो विकास नहीं जो आपके जो आपकी गली में बैट-बॉल खेलता है और आपके घर के शीशे तोड़ता है। ये उसे नहीं ढूंढ रहे। इनका विकास वो है जो इनके जीवन में बदलाव लाएगा, इनके गाँव में सड़क लाएगा, इनके पोते-पोतियों के लिए शिक्षा लाएगा, इनके खेतों में हर साल लहलहाती फसल लाएगा। उस विकास को ढूंढ रहे हैं ये, सालों से।

थोड़ा और ध्यान से देखा तो पाया कि दरअसल इनकी आँखों पर एक चश्मा है। वो भी अब धुंधला सा हो गया है। जो चश्मा उनको रास्ता साफ़ देखने के लिए दिया गया था कहीं उसी की धुन्ध्लाहट तो इनके विकास का रास्ता नहीं रोक रही है? कहीं उसके कारण ही तो ये अपना रास्ता ढूंढ नहीं पा रहे? कहीं चश्मा बदल कर देखने की आवश्यकता तो नहीं है?

शायद है। पर शायद उन्हें नहीं, हमें है। शायद हमारे आँखों पर भी ऐसा ही एक चश्मा है। शायद वो भी अब धुंधला पड़ गया है। इसलिए अब शायद हमें भी विकास का रास्ता सही से दिखाई नहीं दे रहा है। शायद हम अगर हम चश्मा बदल कर देखें तो हमें अपनी गलतियाँ पता चलें। वो गलतियाँ जिनकी सज़ा शायद इन बाबा को भी भुगतनी पड़ रही है।

खैर, आशा करता हूँ कि इससे पहले कि आँखें मोतियाबिंद का शिकार होकर हमेशा के लिए धुंधली हो जाएँ, हम अपना चश्मा बदल लेंगे। रास्ता साफ़ नज़र आएगा और शायद मंजिल भी। मैं बदलने की कोशिश कर रहा हूँ, आप भी कीजिये। 

2 comments:

  1. You've used the metaphor of the glasses and 'clouded vision' beautifully.

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    1. must rethink the lenses that we look at the world with

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