Monday, 16 February 2015

वो तीन दिन बर्लिन में

२०११ में पहली बार यूरोप जाने का मौका मिला। अगर आपने मेरे लंदन वाले पोस्ट पढ़े हैं तो आप अंदाजा लगा सकते हैं क्यों? अगर आपने नहीं पढ़े हैं तो आप पढ़ सकते हैं यहाँ और यहाँ। खैर, पहली बार यूरोप जाने का मौका भी मिला एक कांफ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए। जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक विश्वविद्यालय में आयोजित इस कांफ्रेंस में एक पोस्टर ले के चला था मैं। कांफ्रेंस के एक दिन पहले पंहुचा। बर्लिन हवाईअड्डे पर जैसे ही अपना बैग उठाया सामने कुछ मुश्टंडे खड़े दिखे। नीली जीन्स और टीशर्ट पहने एक मुश्टंडे ने मुझे कोने में बुलाया और बैग खोलने को कहा। मैं थोड़ा डरा, थोड़ा सहमा, थोड़ा जेट लैग में, हैरान परेशान उसकी तरफ देखता रह गया। मुश्टंडे ने फिर कहा बैग खोलने को। मैंने बैग खोल दिया। उसने पूछा अगर मैं कोई ऐसी चीज़ लाया हूँ जिसकी इजाज़त नहीं है। मैंने कहा नहीं और अल्लाह के करम से उसने मुझे जाने को कहा। बाद में मित्रों से मालूम हुआ कि ये मुश्टंडे कस्टम के अधिकारी थे। जर्मनी में ऐसा होता है। हिन्दुस्तान में तो वर्दी का रोब दूर से ही दिख जाता है। पर कौन जाने आज कल हिन्दुस्तान में भी सादी वर्दी में मुश्टंडे जैसे दिखने वाले पुलिस वाले हुआ करते होंगे।
खैर वहाँ से निकला और होटल पहुँचा। छोटा रूम, उसमें कोने में गुसलखाना, बिस्तर के ऊपर बिस्तर। प्यासा था बहुत। पानी की बोतल थी ही नहीं कमरे में। थका हुआ था। नीचे जाने का मन नहीं हुआ। और सोचा रहा था न जाने होटल वाले पानी का कितना माँग बैठें। हिन्दुस्तानी होने के नाते पैसे बचाना मेरा पहला कर्म था। चाहे प्यास क्यों न रहना पड़े। शाम में वैसे भी जलपान के लिए कुछ लोगों से मिलना था एक रेस्तरां में। तभी खाने और पानी भी पीने का तय किया। अब तक हर चीज़ से अचंभित था। खर शाम में जो लोग मुझे रेस्तरां ले जाने आये उनमें से एक ने मेरे गुसलखाने का इस्तेमाल करने की इज़ाज़त मांगी। उसके बाद उन्होंने कमरे में रखा गिलास उठाया और नल से भरके पानी पी लिया। मैं देखता ही रह गया। दोपहर से प्यासा बैठा था मैं बोतल के बिना और यहाँ लोग नल से पानी पी रहे थे। मित्रों ने बता कि यूरोप में नल का पानी भी पीने लायक होता है। उसी पानी से पकाना, पीना, नहाना, और धोना भी। ओह नहीं, धोते तो लोग यहाँ हैं ही नहीं। कागज़ से पोछना। खैर और भी कहानियां हैं उन तीन दिनों के खट्टे मीठे एहसासों की। और सुनाऊंगा अगली बार। अभी तस्वीरें देखिये उस पहली यूरोप यात्रा की।

पुरानी सोवियत कारें। कभी पुलिस घूमा करती थी इनमें। आज कल टूरिस्ट आनंद उठाते हैं इनका।