Monday, 18 January 2016

हम लोग लिफाफी हें

हम लोग लिफाफी हें। 

गांव घर में कोई काज, मने ओकेजन जैसे कि श्राद्ध या शादी-ब्याह हुआ तो ऐटेंड करने वाले रिलेटिव लोग के लिए अलग अलग नियम होता है।

कल इ-रिकशा पे हर हर महादेव चैक से धर आ रहे थे तो बगल में बैठे हुए महतो जी से गप होने लगा। पब्लिक ट्रांसपोर्ट पे अगल बगल के लोग से गप सराका आम बात है बिहार में। कौन कहाँ जा रहा है, क्या कर रहा है पब्लिक नॉलेज होना चाहिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर।

खैर, महतो जी 2 बच्चा, 1 बोरा, 1 झोला और 1 डेकची साथ में ले जा रहे थे। पता चला कि बुतरू लोग के नानी का देहांत हो गया या आ सब लोग ऊसके काज के लिए जा रहे थे। 
महतो जी कहे लिफाफी बने से काम नै चलतो। 

महतो जी के हिसाब से नियम है:

मृत्यु: 2 किलो चावल, 2 किलो दाल, 2 किलो अल्लू आ 5 किलो दही। यही सब बोरा, झोला आ डेकची में ले के चले थे महतो जी ससुराल।

लड़की का शादी: कपड़ा लत्ता आ पैसा।

लड़का का शादी: हाथ डोलाते डोलाते चले जाइए आ कुछ कपड़ा लत्ता लैये के आइए।

आ हम लोग जो सहरी हो गए हैं न सो सब चीज में ऐगो लिफाफा में पैसा लेके पहुंच जाते हैं। नो थाट, नो इफोर्ट।

हम लोग लिफाफी हैं।

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