Tuesday, 9 January 2018

ऐसा काम ही देखने को मिलता था / This was rarely seen

जीवन ठाकुर अक्सर ठाकुर जीवन भी कहे जाते थे। जात से ठाकुर थे, और गांव के ठाकुर भी। ऐसा काम ही देखने को मिलता था। 
वैसे अब तो नाम के ही ठाकुर थे। परिवार छोटा था। कुछ ज़मीन अपने लिए रख के बाकी गांव वालों में बाँट दी थी। ऐसा कम ही होता था। 
जीवन पढ़े लिखे नहीं थे। खेती बड़ी का भी ज्यादा उत्साह नहीं था। खाने पीने का बहुत शौक था। खाने का, और पकने का भी। कोई रोता हुआ बच्चा मिल जाए तो तुरंत गोद में उठा लेते थे। २ मिनट में बच्चा चुप। घर का खूब ध्यान रखते थे। मन भी लगता था। 
ठाकुर साहेब की घर वाली बीए पास थी। पंचायत के कॉलेज में मास्टरनी थी। सप्ताह में ३ दिन पढ़ाती थी और ३ दिन खेत देखती थी। देखती क्या, खुद ट्रेक्टर चला के खेत जोतती थी, टाउन जा के बीज़ और खाद खरीदती थी। घर का हिसाब क़िताब रखती थी। वैसे धीरे धीरे अब ठाकुर साहेब को भी सिखा रही थी हिसाब किताब। 

मंगलू पंडित का परिवार हमेशा से पूजा पाठ में रहा था। उनके बाबूजी गांव के पुरोहित होते थे। गांव का मंदिर भी मैनेज करते थे। मंगलू का मन कभी इसमें लगा नहीं। उनको टेक्निकल काम बढ़िया लगता था और चमड़े का गंध से आनंद आता था। बचपन में एक बार बाबूजी के साथ दुर्गा के मेला में गए थे। वहाँ मोची का काम देखा तो उसी में रम गए। क्या कलाकारी, कितना जरूरी काम। गांव में जूता बनाने लगे और टाउन में दुकान खोल दिए। अब तो गांव में कोई जानवर भी मर जाए तो खरीद लेते थे और खुद उठाने पहुँच जाते थे। ब्राह्मण जात के थे, लेकिन काम तो काम है। 

गांव के मंदिर का क्या? राधेश्याम डोम की बेटी अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से संस्कृत ऑनर्स की थी। पंचायत के कॉलेज में ठाकुर साहेब के वाइफ के साथ पढ़ाती थी और मंदिर का पूजा पाठ भी देखती थी। अब वो गांव की पुरोहित थी। उसका पति भी यहीं गांव में रहता था, ठकुराइन के खेत में काम करता था। 

आज जुताई का दिन था। ठकुराइन ट्रेक्टर ले के खेत पहुंची हुई थी। राधेश्याम का दामाद टाइम पे पहुंच गया था। आज लछमी और सगरू का भी काम था। दोनों का घर अगल बगल में था। आज लछमी का दुल्हा और सगरू की घरवाली बाल-बच्चा का ध्यान रखेंगे और साथ में खाना भी बना लेंगे। 

ठकुराइन लछमी और सगरू को आते हुए देखी। लछमी सगरू को कुछ कही। सगरू जोर से हंसा। 

महिला कॉलेज के गेट पे नीम के पेड़ के नीचे सोए रिक्शावाले की नींद टूट गई। सपना देख रहा था कोई। उसने अपनी आँखें हलकी सी खोली, करवट बदली, और वापस सो गया।

the village Durga Puja fair

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Jeevan Thakur was also often called Thakur Jeevan. He was thakur by caste, and also thakur (landlord) of the village. This was rarely seen.
By the way, he was thakur only in name. His family was small. He kept some land for himself and rest distributed among the villagers. This rarely happened.
Jeevan was not educated. He wasn't very enthusiastic about farming either. He was very fond of food; of eating and even cooking. He was very found of children. He had magical powers of pacifying crying babies. He took great care of the house. He enjoyed this too.

Thakur Saheb's wife was BA pass. She was a teacher in the local college. She taught 3 days a week and watched the farm 3 days. In fact she drove the tractor, farmed the land, and bought seeds and manure from town. She also kept the family accounts. By the way, she was now slowly teaching Thakur Saheb.

The family of Mangalu Pandit had always been handled scriptures. His father was the village priest. He also managed the village temple. Manglu never got into it. He liked technical work and enjoyed the smell of leather. Once in his childhood, his father took him to the Durga Puja fair. There he saw a cobbler and got into the work. What artwork, and how important it was. He started making shoes in the village and opened the shop in town. Now if an animal died in the village then he bought it and even picked it up. He was Brahmins by caste, but work is work.

What about the village temple? Radheshyam Dome's daughter had Sanskrit Honours degree from Aligarh Muslim University. She taught in the local college, with Thakur Saheb's wife (Thakurain), and also conducted prayers in the temple. Now she was the village priest. Her husband also lived in the village, and worked in Thakurain's fields.

Today was the plowing day. Thakurain drove the tractor to the farm. Radhey Shyam's son-in-law was there on time. Lachmi and Saguru were also needed at the farm. Their houses were next to each other. Today, Lachmi's husband and Saguru's wife will take care of the children and make dinner together.

Thakurain saw Lachmi and Saguru coming. Lachmi said something to Sagru. Saguru laughed loudly.

The rickshawala sleeping under the Neem tree on the gate of women's college woke up. He was dreaming. He opened his eyes, turned and went back to sleep.

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