Thursday, 7 May 2020

थम्ब्स अप इंचार्ज

डॉक्टर चच्चा के बेटी का बियाह था। अपनी रजनी दीदी। मई का महीना रहा होगा। १३ - १४ साल के रहे होंगे हम। सब लोग अपना मारुती भान में भर के देबघर पहुंच गए। रास्ता में खाते पीते। गर्मी छुट्टी था। हॉलीडे होमवर्क मिला था लेकिन चिन्ता किसको था।

शादी में तरह तरह का काम रहता है। कोय पंडाल लगवा रहा है, कोय जनवासा का इंतजाम देख रहा है। कोय खाना बनवाने का व्यवस्था करवा रहा है, तो कोई अरोसी परोसी के घर में दरी जाजिम लगवा रहा है, घरवैया लोग के रहने के लिए।

भंडारा का कण्ट्रोल जिसके हाँथ में रहता है उसको बहुत पॉवर रहता है। भोजन पानी चलवाना रुकवाना कोय खेल बात थोड़े है। जिसको मन हुआ एगो रसगुल्ला खिला दिए, जिसको मन हुआ मना कर दिए। जिम्मेदारी भी बहुत है। भोजन पानी ठीक से रखा जाना है, सबको खाना पानी पूरा होना चाहिए। बरियाती के लिए अलग से सब कुछ सही से रहना चाहिए।

खैर शादी के एक दिन पहले मंझला भईया हमको बुलाए और एगो चाभी दिए। साथ में लेके चले अ दलान के बगल बला रूम खोले। अंदर में एगो बड़का ड्रम में बर्फ भरवा दिए थे। इ था ठंढा (कोल्ड ड्रिंक्स) को चिल (ठंढा) रखने का इंतजाम। ये हिंदी भाषा भी अजब हो गई है। अंग्रेजी को हिंदी और हिंदी को अंग्रेजी। मेरे गांव में लोग कोल्ड ड्रिंक्स को ठंढ़ा कहते हैं। और क्या कोल्ड ड्रिंक ठंढा है, ये पूछने के लिए कहते हैं: चिल है क्या जी? तो दूकान पे जाएंगे और पूछेंगे: ठंढ़ा चिल है क्या जी?

ख़ैर ठंढा को चिल रखने का इंतजाम था बड़का ड्रम में। ड्रम में बर्फ के साथ ठंढा भी भरा हुआ था। मने थम्ब्स अप, माजा, लिम्का, फांटा, स्प्राइट। सब तरह का ठंढा आया था। भईया कहे सब बरियाती के लिए आया है। चाभी अपने पास बढ़िया से रखना। जब कहेंगे तब खोल के निकलवा देना ठंढा। अ बरियाती के बाद बच जाएगा तब घरबइया लोग को पिलाने का बिचार किया जाएगा।

 ठंढा हमको भी खूब पसंद था तब। लेकिन इतना बड़ा जिम्मेदारी के बोझ में हम चोरा के ठंढा पीने के बारे में सोचियो नै पाए। खैर बाराती आया। सब आव-भगत बढ़िया से हुआ। बीच बीच में और तरह तरह का बात हुआ। दूसरे बार कहेंगे और कहानी। अभी इसको आगे बढ़ाते हैं।

बाराती सब चला गया। बहुत ठंढा का बोतल बच गया था। भईया कहे अब अगले २-३ दिन घर बाला लोग सबको पिलाया जाए। ठंढा के तो सब लोग शौकीन थे ही। लेकिन ठंढा पीने वाला लोग का एक खासियत होता है। सबका एक रंग का ठंढा पसंदीदा रहता है। किसी का करका (कोला), किसी का पियरका (फांटा टाइप), किसी का उजरका (मने स्प्राइट टाइप)। मजबूरी में तो जो मिले फ्री में उसको गटक लेंगे। लेकिन चॉईस रहे तो जो पसंद है वही लेंगे।

खैर ठंढा का राउंड चलने लगा। बड़का चाचा भी ठंढा के शौकीन थे। लेकिन करका उनको एकदम पसंद नै था। कहते थे कड़वा लगता है। पसंद का था उनके पियरका। नारंगी का स्वाद। आह हा है! नै है पियरका ता उजरका चलेगा। लेकिन करका, नै हो नै। वैसे बड़का चाचा अकेले नै थे करका को नापसंद करने वाले। उनके उम्र का बहुत लोग को देखते थे उस समय करका नापसंद करते। सायद करा था जादे, पीने में। थम्ब्स अप का मर्दानगी भरा प्रचार इसी छवी के साथ तो होत था और होता है। कड़ा है, सबके बस का नहीं है। मर्दों के लिए, जवान मर्दो के लिए, जिनके दिल में जोश है, जस्बा है। सलमान भाई जैसे। कहाँ सलमान भाई और कहाँ हम और हमारे चच्चा। खैर उनके उम्र के ज्यादा लोग करका ठंढा को एवॉइडे करते थे। और हमलोग जैसा नया नया बच्चा लोग करके के पीछे जाता था। खुद को मर्द सिद्ध करने का जल्दी था सबको।

अच्छा तो ड्रम से ठंढा निकलना शुरू हो गया। रोज कोई आते जाते रहता था और एक दो राउंड ठंढा चल जाता था। बड़का चाचा हर बार पियरके पर रहते थे। खैर एक दिन बड़का चाचा थोड़ा परेशान लगे। हम पूछे क्या बात है तो कहे कि दो दिन से गैस से प्रचंड युद्ध हो रहा है। गैस से बहुत पड़ेशान हैं। थम्ब्स अप इंचार्ज के पास एक ही दवाई - थम्ब्स अप। हम कहे चाचा जी, करका बला ठंढा तनी पीजिएगा, खूब ढकार होगा। ठंढा अंदर, गैस बाहर।

चाचा जी थोड़ा हिचकिचाए, थोड़ा घबराए। कहे, करका त पीए में बढ़िया नै लगै छौ।पियरका से नै होतै? हम कहे, एक बार टॉय करिए न चाचा जी। नै ठीक लगे तो पियरका निकाल के दे देंगे। अच्छा तो मान गए हार पार के। गैस से परेशान थे ही, टॉय करने में क्या था? खोल दिए हम एगो थम्ब्स अप। टुप्पप्प, झिस्ससससससस.....

चाचा जी एक घूँट मारे। फिर थोड़ा मुँह बनाये। करके का स्वाद ..... फिर २-४ घूँट और मारे। फिर .... बोययययय ययययययययय बोयययय। ढकार पे ढकार। ५ मिनट के बाद चाचा जी कहे। गैस त सब निकैल गेलौ। आराम लगै छै। थम्ब्स अप इंचार्ज के लिए इससे जादे ख़ुशी का बात क्या होगा। ठंढा अंदर, गैस बाहर।

ये सुबह का बात था। शाम को चाचा जी मेरे पास आए और बोले, एगो करका निकाइल के दे। गैस भे गेलो फेरो। बस फिर क्या? सुबह शाम थम्ब्स अप चलने लगा चाचा जी का। ठंढा अंदर, गैस बाहर। ठंढा का बोतल सब ड्राम के पेंदा में सट गया।

इंचार्ज हम नामे के रह गए। थम्ब्स अप त सब चाचा जी का हो गया। चाभी मेरे हाथ में, थम्ब्स अप उनके हाथ में। ठंढा अंदर, गैस बाहर।

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